सुपरिचित कवयित्री डाॅ. यासमीन मूमल की तीन कविताएँ

 

‘प्रीति’

सात्विक रीति है

उसे कोई पूरा पढ़ने का 

प्रयास कर सकता है भला ?

उच्छ्वासित 

आनन्दित

आह्लादित, 

सुगन्धित

भावों से युक्त होकर

जीवन मरुथल में

 घुमावदार कावेरी सी

  विश्रृंखलित,अल्हड़

भाव, विभाव, अनुभाव से पूरित

 नव रसों को 

बरसाती 

तीव्रता से बहती रहती रहती है।

जब-जब होता है 

 किसलयमयी अधरों से 

शब्दों का प्रस्फुटन

सज्जित होते हैं सुन्दर अलंकार 

कभी अभिधा 

कभी लक्षणा

कभी व्यंजना के सुन्दर वस्त्र 

साहित्य तन 

को सुसज्जित करते हैं।

भाषा में प्रसाद,माधुर्य और ओज

रीति,अलंकार

कविता कामिनी रस

घोल कर मुख खोलना बोलना  

 है तुम्हारा जन्मसिद्ध 

अधिकार।

छंदों से भले ही कम नाता रखना 

पसन्द है तुम्हें मगर

मुक्त काव्य धारा में निर्बाध

निष्कंटक

स्वछंदतावादी रश्मि चमकती

साधारणीकरण पताका लहराये

सिद्धिदात्री रूप

में उपस्थित होती हो,

 लोग अनायास ही कह उठते हैं..

 शाश्वत आसक्ति की जय।

————–

सिंदूरी सूरज’

सूजी, बोझिल

धुँधलाती, मुरझाती

आँखों में देखने को 

हीरे सी चमक

घुटी,मौन आवाज़ में लाने को

 घुँघरू सी खनक

फहरते देखने को  समर्पित 

विजय पताका

कर्तव्य,अभियान अभिमान 

 प्रिय प्राण पथ पर

 माथे की भाग्य

 रेखाओं पर

मचलती भावनामयी 

अदाओं पर

गोल अंगारे सा 

सिंदूरी सूरज सजा लिया मैंने।

 सर्वस्व हुआ जब अर्पण

लजाई तरुणाई भी आभा देख

मुस्काने इतराने लगा दर्पण,

मन ने देखना चाहा 

योद्धा को जीतते हुए 

जीवन का हर समर

यश,मुस्कान रहे अमर

मन के रिश्ते नहीं टूटते सहज

सामाजिक बंधन 

 सिर्फ़ ख़ानापूर्ती होती है महज़,

  अरी ! नाचती इच्छाओं

 तनिक मल्हार तो गाओ

भीगे तन मन प्रेम फुहार

निःस्वार्थ प्रेम पथ पर

फिसलन सघन

विचलित न होना डरकर

चलना ही जीवन।

—————

सुगन्धित सृष्टि और सूरज’

एक दूसरे के लिये कुछ भी नहीं रहा

दोनो की भावनाएँ हुई बाँझ

न प्रेम न अपनत्व न आत्मीयता का चरम,

  केवल शब्द जन्म लेते हैं,

न भाव अब कल- कल बहते हैं,

ज़माने भर की नज़रे और बातें सहते हैं

पर निश्चल , भलभल नयन 

कुछ न कहते हैं।

निज अपनत्व भाव,

आपके लिये बेकार

हम अपने अथाह प्रेम

स्वाभिमान से लाचार।

मन मस्तिष्क में हलचल होती हरपल 

गूँजते हैं कुछ बेनाम, अनमने, सरफिरे विचार।

दिल की दिवार से ठोकर खा, खा कर

सर पटकते हैं अपनी बेबाकी पर

छिटकते हैं अंधेरे भटकाव पथ पर

भावनाएँ बिलखती, सिसकती रहती हैं 

 रुंधे गले से घुट, घुट कर

पानी की लहर सी ज़िह्न के किनारों से टकराकर

अनमनी गहराई में सिमट जाते हैं विचार,

ठगी हुई गोरी सी सृष्टि 

 पीड़ा से छलके नैनो से कोहरा  ..

बन-बन कर बहाने लगती अपने अस्तित्व को।

सूरज की बेवफ़ाई भी ग़ज़ब है

 सर्दी में.छुपा रहता है .. 

लता के सब पत्ते टूटकर झड़ने तक, 

जब जलने लगता है स्वयं की आग से ही,

 फड़फड़ाता हुआ चला आता है 

सृष्टि की विनम्र, आत्मीय शरण में

सुगन्धित लताओं की नमी चुराने

लताएँ, सृष्टि की शान होने पर भी 

सहर्ष सब दान कर देती हैं

उसे अपना सब कुछ मान कर

पूर्व जन्म का बिछड़ा प्रेमी जान कर

बसन्त बनकर ,बिखर कर झर-झर कर

सकल ताप हर- हर कर।

 अपनी सुगंध बिखेरती रहती सृष्टि 

कर्त्तव्य पथ पर।

 

 

 

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